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लखीमपुर खीरी के पलिया में ‘सफेद मौत’ का जाल! आखिर किसकी छत्रछाया में फल-फूल रहा स्मैक का काला कारोबार?

नेपाल बॉर्डर से सटे इलाकों में नशे का बढ़ता नेटवर्क, युवा पीढ़ी पर मंडरा रहा खतरा; स्थानीय लोगों में कई सवाल

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कुछ साल पहले तक शांत माने जाने वाले पलिया और उसके आसपास के इलाके आज एक ऐसे नशे की गिरफ्त में बताए जा रहे हैं, जिसने सैकड़ों युवाओं का भविष्य दांव पर लगा दिया है। आखिर स्मैक का यह कारोबार कैसे चल रहा है और इसके पीछे कौन लोग हैं?

नेपाल सीमा से सटी लखीमपुर खीरी की पलिया तहसील इन दिनों एक ऐसे संकट की चर्चा में है, जो किसी भी समाज के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है। स्थानीय लोगों और सूत्रों के अनुसार क्षेत्र में स्मैक का अवैध कारोबार लगातार बढ़ रहा है और इसकी चपेट में सबसे ज्यादा युवा पीढ़ी आ रही है। पलिया नगर, गौरीफंटा बॉर्डर क्षेत्र, संपूर्णानगर, तिकुनिया और आसपास के कई इलाकों में नशे के बढ़ते प्रभाव को लेकर लोग चिंता जता रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि स्मैक का कारोबार अब केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि यह एक संगठित नेटवर्क का रूप ले चुका है। लोगों का दावा है कि कुछ मोहल्लों में पूरे परिवार इस अवैध धंधे से जुड़े होने की चर्चाएं आम हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन क्षेत्र में बढ़ती नशाखोरी को लेकर लोगों की चिंता लगातार बढ़ रही है।
आखिर क्या है स्मैक?
स्मैक हेरोइन का एक खतरनाक रूप माना जाता है। यह एक अत्यधिक नशे वाली मादक पदार्थ श्रेणी में आता है, जिसकी लत लगने के बाद व्यक्ति धीरे-धीरे मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर होने लगता है। शुरुआत में इसे लेने वाला व्यक्ति खुद को तनावमुक्त महसूस करता है, लेकिन कुछ ही समय बाद शरीर इसकी मांग करने लगता है।
विशेषज्ञों के अनुसार स्मैक के लगातार सेवन से व्यक्ति का वजन कम होने लगता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ जाती है, मानसिक संतुलन प्रभावित होता है और कई बार नशे की लत अपराध की दुनिया की ओर भी धकेल देती है।
सीमा क्षेत्र होने का फायदा उठा रहे तस्कर?
पलिया और संपूर्णानगर का बड़ा भूभाग नेपाल सीमा से जुड़ा हुआ है। गौरीफंटा बॉर्डर और आसपास के कई मार्ग लंबे समय से तस्करी गतिविधियों के लिए संवेदनशील माने जाते रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि सीमा की भौगोलिक परिस्थितियों का फायदा उठाकर नशे का नेटवर्क संचालित किया जा रहा है।
सूत्रों का दावा है कि कुछ नशीले पदार्थ उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों से होकर पलिया तक पहुंचते हैं, जबकि कुछ खेपें अन्य जिलों के रास्ते भी इलाके में लाई जाती हैं। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्र में बढ़ती बरामदगियां और नशे के मामलों ने लोगों की चिंताओं को बढ़ा दिया है।
सबसे बड़ा निशाना बन रहे युवा
स्मैक का सबसे भयावह असर युवाओं पर पड़ रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार स्कूल-कॉलेज की उम्र के कई लड़के इस नशे की गिरफ्त में आ चुके हैं। शुरुआत में शौक के तौर पर लिया गया नशा धीरे-धीरे आदत बन जाता है और फिर व्यक्ति इसके बिना नहीं रह पाता।
नशे की लत के कारण परिवार आर्थिक संकट में फंस जाते हैं। कई युवक घर का सामान बेचने तक पर मजबूर हो जाते हैं। रोजगार, शिक्षा और सामाजिक जीवन पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि समाज के जागरूक लोग इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर खतरा मान रहे हैं।
कार्रवाई होती है, लेकिन सवाल भी उठते हैं
पुलिस और प्रशासन द्वारा समय-समय पर नशीले पदार्थों के खिलाफ अभियान चलाए जाते हैं और गिरफ्तारियां भी होती हैं। हालांकि स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठते रहे हैं कि आखिर इतनी कार्रवाई के बावजूद नशे का नेटवर्क पूरी तरह खत्म क्यों नहीं हो पा रहा।
कुछ लोगों का आरोप है कि बड़े नेटवर्क तक पहुंचने के बजाय अक्सर छोटे स्तर के कैरियर या सप्लायर पकड़े जाते हैं, जबकि कथित सरगना कानून के शिकंजे से दूर बने रहते हैं। इन आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित विभागों की ओर से भी इस प्रकार के आरोपों को लेकर कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है।
क्या मिलीभगत की जांच जरूरी है?
इलाके में यह चर्चा भी होती रहती है कि यदि पूरे नेटवर्क की निष्पक्ष और गहन जांच हो तो कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं। सूत्रों के माने तो पुलिस विभाग से जुड़े कुछ लोगों के कॉल डिटेल और CDR निकल जाए तो बड़े-बड़े नाम का खुलासा हो सकता है और इस अवैध धंधे पर रोक लगाए जा सकती है हालांकि यह केवल स्थानीय चर्चाओं और सूत्रों के दावे हैं। बिना ठोस साक्ष्यों के किसी व्यक्ति या संस्था पर आरोप लगाना उचित नहीं होगा।
फिर भी यह सवाल जरूर उठता है कि यदि क्षेत्र में नशे का कारोबार वास्तव में बढ़ रहा है तो इसके पीछे मौजूद पूरे नेटवर्क को चिन्हित करने और उसे ध्वस्त करने की जरूरत है। विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल छोटे तस्करों की गिरफ्तारी से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
समाज को भी निभानी होगी जिम्मेदारी
नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस या प्रशासन की नहीं है। परिवारों, शिक्षण संस्थानों, सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों को भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। युवाओं को खेल, शिक्षा और सकारात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित करना समय की मांग है।
पलिया और नेपाल सीमा से सटे क्षेत्रों में बढ़ती नशे की चर्चाओं ने एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। यदि समय रहते इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हुआ तो इसका असर केवल कुछ परिवारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे समाज को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस ‘सफेद मौत’ के कारोबार की जड़ें कितनी गहरी हैं और इन्हें खत्म करने के लिए कितनी मजबूत कार्रवाई की जरूरत है?

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