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योगी के ड्रीम प्रोजेक्ट शिव कॉरिडोर पर मंडराया खतरा? 84 करोड़ के ROB में खामी के आरोप, 15 दिन में उद्घाटन की तैयारी पर उठे बड़े सवाल

निर्माणाधीन रेलवे ओवरब्रिज में स्ट्रक्चरल कमी की चर्चा, जांच रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं; स्थानीय लोग और जनप्रतिनिधि सुरक्षा को लेकर जता रहे चिंता

गोला गोकर्णनाथ को धार्मिक और पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान देने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ड्रीम प्रोजेक्ट शिव कॉरिडोर तेजी से आकार ले रहा है। लेकिन इसी शहर में 84 करोड़ रुपये की लागत से बन रहे रेलवे ओवरब्रिज को लेकर उठ रहे सवाल अब चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि पुल के निर्माण के दौरान तकनीकी खामियां सामने आई हैं, जबकि अधिकारियों का कहना है कि आवश्यक सुधार के बाद जल्द इसे चालू किया जाएगा। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या सभी सुरक्षा मानकों की पूरी तरह जांच किए बिना जल्दबाजी में उद्घाटन की तैयारी की जा रही है?

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गोला गोकर्णनाथ को धार्मिक पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ड्रीम प्रोजेक्ट माने जा रहे शिव कॉरिडोर के चलते गोला गोकर्णनाथ की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर तेजी से बढ़ रही है। हर साल सावन में लाखों श्रद्धालु छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध भगवान शिव की नगरी गोला पहुंचते हैं। ऐसे में शहर की यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग-730 पर लगभग 84 करोड़ रुपये की लागत से रेलवे ओवरब्रिज (ROB) का निर्माण कराया जा रहा है।


लेकिन उद्घाटन से पहले ही यह महत्वाकांक्षी परियोजना विवादों में घिरती दिखाई दे रही है। स्थानीय लोगों, जनप्रतिनिधियों और कुछ सामाजिक संगठनों द्वारा पुल की निर्माण गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि रेलवे लाइन के ऊपर बने हिस्से में निर्माण के दौरान तकनीकी खामियां सामने आई हैं, जिन पर स्थायी समाधान के बजाय केवल सुधारात्मक उपाय किए जा रहे हैं।
स्थानीय लोगों का दावा है कि पुल के एक हिस्से में दोनों ओर की दीवारें सामान्य स्थिति से बाहर की तरफ फैलती हुई दिखाई दीं। इसके बाद निर्माण एजेंसी द्वारा पुल के अंदर लोहे की मोटी रॉड, स्टील प्लेट और बोल्ट लगाकर अतिरिक्त सपोर्ट देने का कार्य किया गया। साथ ही पुल के बेस पर अतिरिक्त संरचना बनाकर दबाव को नियंत्रित करने का प्रयास भी किया गया।


हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन मौके के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई हैं। यही कारण है कि लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि यदि निर्माण के दौरान ही अतिरिक्त सपोर्ट की आवश्यकता पड़ गई तो भविष्य में भारी ट्रैफिक का दबाव झेलने की स्थिति में पुल पूरी तरह सुरक्षित रहेगा या नहीं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुल की तकनीकी जांच मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआईटी) के विशेषज्ञों से कराई गई। जानकारी के अनुसार विशेषज्ञ टीम दो बार मौके का निरीक्षण कर चुकी है। हालांकि अब तक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। रिपोर्ट सार्वजनिक न होने के कारण लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं।
इसी बीच अधिकारियों द्वारा यह कहा जा रहा है कि आवश्यक सुधार कार्य किए जा रहे हैं और करीब 15 दिनों के भीतर पुल को यातायात के लिए तैयार कर दिया जाएगा। यहीं से विवाद और गहरा हो गया है। स्थानीय नागरिक सवाल उठा रहे हैं कि जब जांच रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई और तकनीकी परीक्षण की पूरी जानकारी सामने नहीं आई, तब उद्घाटन की जल्दबाजी क्यों दिखाई जा रही है।
बुधवार को जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति (दिशा) की बैठक में भी यह मुद्दा प्रमुखता से उठा। गोला नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष विजय शुक्ला ‘रिंकू’ ने बैठक में पुल की स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सावन का महीना नजदीक है और लाखों श्रद्धालु गोला गोकर्णनाथ पहुंचने वाले हैं। यदि पुल समय पर और सुरक्षित तरीके से तैयार नहीं हुआ तो शहर की यातायात व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है।


गोला गोकर्णनाथ पहले ही शिव कॉरिडोर परियोजना के चलते बड़े विकास कार्यों का केंद्र बना हुआ है। ऐसे में यदि शहर की सबसे महत्वपूर्ण यातायात परियोजना को लेकर सुरक्षा संबंधी सवाल उठते हैं तो इसका असर न केवल स्थानीय लोगों बल्कि बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं पर भी पड़ सकता है।
चिंता का एक बड़ा कारण यह भी है कि पुल के नीचे से रेलवे की इलेक्ट्रिक लाइन गुजरती है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी रेलवे ओवरब्रिज में संरचनात्मक मजबूती सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। इसलिए किसी भी प्रकार की तकनीकी आशंका को पूरी तरह समाप्त किए बिना पुल को चालू करना उचित नहीं माना जाता।
इस पूरे मामले में एक और सवाल अधिकारियों की पारदर्शिता को लेकर उठ रहा है। जब मीडिया ने संबंधित विभाग के अधिकारियों से पुल की स्थिति और जांच रिपोर्ट के संबंध में जानकारी लेने का प्रयास किया तो अधिशासी अभियंता शुभ नारायण मिश्र ने कैमरे पर बयान देने से इनकार कर दिया। इससे लोगों के बीच संदेह और बढ़ गया है।
हालांकि यह भी तथ्य है कि अभी तक किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा है कि पुल असुरक्षित है या उसे उपयोग में नहीं लाया जा सकता। इसलिए सभी दावों और आशंकाओं की अंतिम पुष्टि तकनीकी जांच रिपोर्ट आने के बाद ही हो सकेगी। लेकिन जब एक सार्वजनिक परियोजना पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए हों और वह लाखों लोगों की सुरक्षा से जुड़ी हो, तब पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग स्वाभाविक है।
अब निगाहें विशेषज्ञों की रिपोर्ट और प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं। लोग चाहते हैं कि पुल को जल्दबाजी में शुरू करने के बजाय उसकी गुणवत्ता और सुरक्षा का पूरा परीक्षण कराया जाए। क्योंकि यदि भविष्य में कोई तकनीकी समस्या सामने आती है तो उसका असर केवल यातायात पर ही नहीं बल्कि गोला गोकर्णनाथ की प्रतिष्ठा और शिव कॉरिडोर जैसे महत्वाकांक्षी विकास कार्यों पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या उद्घाटन से पहले सभी तकनीकी आशंकाओं का समाधान हो चुका है, या फिर विकास की रफ्तार में सुरक्षा संबंधी सवालों को नजरअंदाज किया जा रहा है? इसका जवाब आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट और प्रशासनिक फैसलों से ही मिलेगा।

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