“यूपी के गांवों में बड़ा सत्ता बदलाव… चुनाव से पहले क्यों बदला गया पूरा खेल?”
57 हजार से ज्यादा ग्राम प्रधान अब बनेंगे प्रशासक, सीएम योगी के फैसले ने बदली पंचायत राजनीति

उत्तर प्रदेश की पंचायत राजनीति में पहली बार ऐसा फैसला होने जा रहा है, जिसने गांव से लेकर सत्ता के गलियारों तक हलचल बढ़ा दी है। पंचायत चुनाव टलने के बीच योगी सरकार ने बड़ा दांव खेलते हुए ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बनाने का फैसला कर लिया है। सवाल अब सिर्फ प्रशासन का नहीं, बल्कि आने वाले चुनावी समीकरणों का भी है।
यूपी में पहली बार लागू होगा नया फॉर्मूला
उत्तर प्रदेश में अब ग्राम प्रधान ही गांवों के प्रशासक की जिम्मेदारी संभालेंगे। मुख्यमंत्री Yogi Adityanath ने पंचायती राज विभाग के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके बाद मंगलवार 26 मई से प्रदेश की सभी ग्राम पंचायतों में मौजूदा प्रधान प्रशासक की भूमिका में आ जाएंगे।
दरअसल, प्रदेश में पंचायत चुनाव समय पर कराना संभव नहीं हो पाया। ऐसे में 26 मई को ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद गांवों में विकास योजनाओं के रुकने का खतरा पैदा हो गया था। इसी वजह से सरकार को प्रशासकों की नियुक्ति करनी पड़ी।
अब तक परंपरा यह रही है कि पंचायतों में एडीओ पंचायत को प्रशासक बनाया जाता था, लेकिन इस बार योगी सरकार ने अलग रास्ता चुना और सीधे ग्राम प्रधानों को ही यह जिम्मेदारी सौंपने का फैसला कर लिया।
57,694 पंचायतों में लागू होगा फैसला
प्रदेश की कुल 57,694 ग्राम पंचायतों में यह व्यवस्था लागू होगी। यानी इतने ही प्रधान अब प्रशासक के तौर पर गांवों की जिम्मेदारी संभालेंगे।
सरकार का मानना है कि इससे गांवों में चल रही विकास योजनाओं की गति प्रभावित नहीं होगी। सड़क, शौचालय, आवास, पंचायत भवन, पेयजल और अन्य ग्रामीण योजनाओं का काम लगातार जारी रह सकेगा।
पंचायती राज विभाग का तर्क है कि जो प्रधान पहले से गांव की जरूरतों और योजनाओं को समझते हैं, वही प्रशासक बनकर काम करेंगे तो फैसले तेज होंगे और कामकाज में रुकावट कम आएगी।
प्रधान संघ की मांग पर लगी मुहर
राष्ट्रीय पंचायत राज्य ग्राम प्रधान संघ लंबे समय से यह मांग कर रहा था कि पंचायत चुनाव तक प्रधानों को ही प्रशासक बनाया जाए।
संघ का कहना था कि एडीओ पंचायत के पास कई गांवों की जिम्मेदारी होती है, ऐसे में वह हर पंचायत की जरूरतों पर प्रभावी तरीके से काम नहीं कर पाता। इससे योजनाओं में देरी और विकास कार्यों में रुकावट आती है।
प्रधान संघ ने सरकार को सुझाव दिया था कि अगर मौजूदा प्रधानों को ही प्रशासक बना दिया जाए तो विकास योजनाएं तेजी से चलती रहेंगी और ग्रामीण स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था भी मजबूत बनी रहेगी।
अब सीएम योगी ने इस मांग को स्वीकार करते हुए नया मॉडल लागू कर दिया है।
क्या पंचायत चुनाव और आगे बढ़ेंगे?
राजनीतिक गलियारों में अब सबसे बड़ी चर्चा पंचायत चुनाव को लेकर हो रही है। माना जा रहा है कि पंचायत चुनाव अब विधानसभा चुनाव के बाद ही कराए जा सकते हैं।
दरअसल, सरकार ने पंचायत सीटों के आरक्षण के लिए डेडिकेटेड ओबीसी आयोग का गठन किया है। आयोग को अपनी रिपोर्ट तैयार करने में करीब छह महीने लग सकते हैं।
ऐसे में आरक्षण सूची अक्टूबर-नवंबर तक आने की संभावना है। उसी दौरान प्रदेश में विधानसभा चुनाव का माहौल भी तेज हो जाएगा। प्रशासन और राजनीतिक दल पूरी तरह विधानसभा चुनाव की तैयारियों में व्यस्त रहेंगे।
इसी वजह से पंचायत चुनाव आगे खिसकने की संभावना काफी बढ़ गई है।
योगी सरकार का बड़ा राजनीतिक दांव?
राजनीतिक जानकार इस फैसले को सिर्फ प्रशासनिक नहीं बल्कि बड़ा राजनीतिक कदम भी मान रहे हैं।
ग्राम प्रधान गांवों में सरकार की योजनाओं का सबसे बड़ा चेहरा होते हैं। ऐसे में उन्हें प्रशासक बनाकर सरकार गांव स्तर पर अपनी पकड़ और मजबूत करना चाहती है।
प्रधानों के जरिए सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को सीधे ग्रामीण जनता तक पहुंचाने में आसानी होगी। इससे पंचायत स्तर पर भाजपा की राजनीतिक पकड़ मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
यानी यह फैसला विकास के साथ-साथ चुनावी रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है।
दूसरे राज्यों में भी लागू हो चुका मॉडल
प्रधानों को प्रशासक बनाने का मॉडल नया जरूर है, लेकिन भाजपा शासित राज्यों में पहले भी इसका प्रयोग हो चुका है।
राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने का फॉर्मूला अपनाया जा चुका है। अब उत्तर प्रदेश भी इसी रास्ते पर आगे बढ़ गया है।
हालांकि, यूपी जैसे बड़े राज्य में पहली बार इतने बड़े स्तर पर यह व्यवस्था लागू की जा रही है। इसलिए इसे पंचायत प्रशासन के इतिहास में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
गांवों की राजनीति में बढ़ेगी हलचल
प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के फैसले के बाद गांवों की राजनीति में हलचल बढ़ना तय माना जा रहा है। विपक्ष इस फैसले को चुनावी रणनीति बता रहा है, जबकि सरकार इसे विकास और प्रशासनिक जरूरत का फैसला बता रही है।
अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि पंचायत चुनाव आखिर कब होते हैं और यह नया प्रयोग गांवों की राजनीति पर कितना असर डालता है।



