लखीमपुर खीरी

“ट्रांसफर में खत्म हुआ ‘जुगाड़ सिस्टम’! लखीमपुर में सीडीओ ने दिखाया ऐसा मॉडल, जिसकी हर तरफ चर्चा”

न सिफारिश, न दौड़-भाग और न बंद कमरे का फैसला... कर्मचारियों ने खुद चुना अपना ब्लॉक, मौके पर मिला स्थानांतरण आदेश।

क्या सरकारी विभागों में भी बिना सिफारिश और बिना दबाव के ट्रांसफर हो सकता है? लखीमपुर खीरी में मुख्य विकास अधिकारी अभिषेक कुमार ने एक ऐसी व्यवस्था लागू की है, जिसने वर्षों से चली आ रही धारणाओं को चुनौती दे दी है।

लखीमपुर खीरी में स्थानांतरण प्रक्रिया को लेकर इस बार जो तस्वीर सामने आई है, वह प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और सुशासन का एक नया उदाहरण बनकर उभरी है। आमतौर पर सरकारी विभागों में ट्रांसफर को लेकर कर्मचारियों की दौड़भाग, सिफारिशें, दबाव और असंतोष की खबरें सामने आती रहती हैं, लेकिन इस बार विकास भवन में कुछ अलग देखने को मिला। यहां मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) अभिषेक कुमार ने स्थानांतरण प्रक्रिया को पूरी तरह खुला, निष्पक्ष और पारदर्शी बनाकर कर्मचारियों के बीच विश्वास का माहौल तैयार किया।
शासन की स्थानांतरण नीति के तहत ग्राम विकास एवं पंचायती राज विभाग में लंबे समय से एक ही स्थान पर कार्यरत कर्मचारियों के स्थानांतरण की प्रक्रिया शुरू की गई। लेकिन इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें किसी भी प्रकार की गोपनीयता या बंद कमरे में निर्णय लेने की परंपरा को जगह नहीं दी गई। इसके बजाय सभी पात्र कर्मचारियों को एक साथ बुलाया गया और उनके सामने विभिन्न विकास खंडों में उपलब्ध रिक्त पदों की जानकारी सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत की गई।
सीडीओ अभिषेक कुमार ने स्वयं पूरी प्रक्रिया की निगरानी की। कर्मचारियों को उनकी वरिष्ठता और वरीयता के आधार पर विकल्प चुनने का अवसर दिया गया। जिस ब्लॉक में रिक्ति उपलब्ध थी, कर्मचारी अपनी पसंद के अनुसार उसे चुनते गए और उसी आधार पर उनकी तैनाती सुनिश्चित की गई। प्रक्रिया पूरी होने के तुरंत बाद कर्मचारियों को उनके स्थानांतरण आदेश भी सौंप दिए गए।
✔ पंचायती राज विभाग में 114 ग्राम पंचायत अधिकारियों के सापेक्ष 11 स्थानांतरण योग्य कर्मचारियों का तबादला।
✔ ग्राम विकास विभाग में 102 ग्राम विकास अधिकारियों के सापेक्ष 10 कर्मचारियों को नई तैनाती।
✔ सभी रिक्तियां कर्मचारियों के सामने सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की गईं।
✔ कर्मचारियों को उनकी पसंद और वरीयता के आधार पर कार्यक्षेत्र आवंटित किया गया।
✔ चयन के तुरंत बाद मौके पर ही स्थानांतरण आदेश जारी किए गए।
इस पारदर्शी मॉडल की चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि यह पहला अवसर नहीं है जब सीडीओ अभिषेक कुमार ने प्रशासनिक प्रक्रिया में नवाचार और पारदर्शिता का परिचय दिया हो। इससे पहले जनपद में 120 एजुकेटर पदों पर भर्ती प्रक्रिया भी पूरी निष्पक्षता के साथ संपन्न कराई गई थी।
उस भर्ती प्रक्रिया में परीक्षा, परिणाम और मेरिट सूची को बेहद कम समय में सार्वजनिक किया गया। इसके बाद दस्तावेज सत्यापन, विद्यालय आवंटन और नियुक्ति पत्र वितरण की पूरी प्रक्रिया को भी पारदर्शी तरीके से संपन्न कराया गया। अभ्यर्थियों को उनकी पसंद और उपलब्धता के अनुसार विद्यालय आवंटित किए गए और उसी दिन नियुक्ति पत्र भी प्रदान कर दिए गए।
प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि सरकारी व्यवस्थाओं में पारदर्शिता तभी दिखाई देती है जब निर्णय लेने की प्रक्रिया सभी संबंधित पक्षों के सामने हो। लखीमपुर खीरी में अपनाए गए इस मॉडल ने यही संदेश दिया है कि यदि नियमों का ईमानदारी से पालन किया जाए तो विवाद और असंतोष की संभावनाएं काफी हद तक समाप्त हो सकती हैं।
कर्मचारियों के बीच भी इस पहल को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। कई कर्मचारियों का कहना है कि पहली बार उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि उनकी पसंद और सुविधा को भी महत्व दिया गया है। इससे न केवल व्यवस्था के प्रति भरोसा बढ़ा है बल्कि कर्मचारियों का मनोबल भी मजबूत हुआ है।
सीडीओ अभिषेक कुमार की कार्यशैली इन दिनों जिले में चर्चा का विषय बनी हुई है। तेज निर्णय क्षमता, समयबद्ध कार्य निष्पादन और नियमों के अनुरूप पारदर्शी प्रक्रिया को प्राथमिकता देना उनकी प्रशासनिक पहचान बनता जा रहा है। यही कारण है कि विकास भवन से लेकर गांवों तक इस ट्रांसफर मॉडल की चर्चा हो रही है।
लखीमपुर खीरी में लागू किया गया यह मॉडल केवल स्थानांतरण प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संदेश भी देता है कि प्रशासनिक निर्णय यदि निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ लिए जाएं तो व्यवस्था में जनता और कर्मचारियों दोनों का विश्वास मजबूत होता है। आने वाले समय में यह मॉडल अन्य विभागों के लिए भी एक प्रेरणास्रोत बन सकता है।

 

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