पहली बारिश में डूब गई छोटी काशी! आखिर किसकी लापरवाही से बना गोला गोकर्णनाथ ‘जलनगर’?
डेढ़ घंटे की बारिश ने खोली नगर पालिका की तैयारियों की पोल, सड़कों पर 1 से 2 फुट पानी, नाले उफनाए, लोगों की गाड़ियां बंद

जिस गोला गोकर्णनाथ को शिवनगरी और छोटी काशी के नाम से जाना जाता है, वहां पहली ही बारिश ने विकास और व्यवस्थाओं पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर क्यों हर साल बरसात आते ही शहर पानी-पानी हो जाता है? और क्या आने वाले समय में शिव मंदिर कॉरिडोर में आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए यह समस्या और बड़ी चुनौती बन सकती है?
लखीमपुर खीरी। छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध गोला गोकर्णनाथ नगर में मानसून की पहली ही तेज बारिश ने नगर पालिका की तैयारियों की हकीकत सामने ला दी। महज डेढ़ घंटे की बारिश के बाद शहर के कई प्रमुख इलाके जलमग्न हो गए। सड़कों पर एक से दो फुट तक पानी भर गया, नाले उफनते नजर आए और कई मोहल्लों में लोगों का घरों से निकलना तक मुश्किल हो गया।

बारिश के बाद शहर का नजारा किसी बाढ़ग्रस्त क्षेत्र जैसा दिखाई दिया। नगर के नीची भूड़, सिद्धिविनायक मैरिज लॉन क्षेत्र, मिल गेट के पास, नीलकंठ मैदान के समीप, तीर्थ क्षेत्र, हनुमान मंदिर मार्ग और मोहल्ला तीर्थ सहित कई इलाकों में भारी जलभराव देखने को मिला। सड़कें तालाब में तब्दील हो गईं और कई स्थानों पर लोगों को घुटनों तक पानी से होकर गुजरना पड़ा।

स्थानीय लोगों का कहना है कि हर वर्ष बरसात के मौसम में यही स्थिति देखने को मिलती है, लेकिन इस बार पहली ही बारिश ने नगर की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कई जगहों पर नालियां गंदगी से भरी हुई मिलीं, जबकि कुछ नाले ओवरफ्लो होकर सड़कों पर पानी उगलते दिखाई दिए। इससे यह साफ नजर आया कि बरसात से पहले नालों और नालियों की सफाई व्यवस्था पर्याप्त नहीं रही।
जलभराव के कारण आम जनजीवन भी प्रभावित हुआ। कई लोग सड़कों पर फंस गए, जबकि कुछ स्थानों पर पानी में फंसकर दोपहिया वाहन बंद हो गए। दुकानदारों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा। बाजार क्षेत्रों में पानी भरने से व्यापार प्रभावित हुआ और लोगों को सुरक्षित स्थानों की तलाश करनी पड़ी।

नगर के नागरिकों का कहना है कि शहर में जल निकासी की स्थायी व्यवस्था का अभाव है। बरसात शुरू होते ही पानी सड़कों पर जमा हो जाता है और कई घंटों तक निकासी नहीं हो पाती। इससे लोगों को हर साल परेशानी झेलनी पड़ती है, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल पाया है।
इस पूरे मामले पर जब नगर पालिका अध्यक्ष रिंकू शुक्ला से बातचीत की गई तो उन्होंने जलभराव की समस्या के पीछे कई कारण बताए। उनका कहना है कि गोला गोकर्णनाथ एक प्राचीन और पौराणिक नगरी है, जहां वर्षों पुरानी बसावट होने के कारण जल निकासी व्यवस्था को आधुनिक स्वरूप देना चुनौतीपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि नगर में कई स्थानों पर अवैध कब्जों की समस्या भी बनी हुई है, जिसके कारण पानी निकासी के प्राकृतिक मार्ग बाधित हो गए हैं। इसके अलावा लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) द्वारा बनाई गई कुछ सड़कों के ऊंचे-नीचे निर्माण के कारण भी पानी का प्रवाह प्रभावित हो रहा है। कई स्थानों पर पानी निकलने के रास्ते अवरुद्ध हो चुके हैं, जिससे बारिश का पानी सड़कों और मोहल्लों में जमा हो जाता है।
नगर पालिका अध्यक्ष के अनुसार इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए एक विस्तृत मेगा प्लान तैयार कर जिला प्रशासन को भेजा गया था। योजना का सर्वे और जांच कार्य भी किया जा चुका है, लेकिन अभी तक अंतिम स्वीकृति नहीं मिल पाई है। इसी कारण जल निकासी परियोजना पर काम शुरू नहीं हो सका है।
उन्होंने भरोसा दिलाया कि नगर पालिका शासन और प्रशासन के साथ समन्वय स्थापित कर जल्द ही समस्या के समाधान का प्रयास करेगी, ताकि बरसात के दौरान नागरिकों को राहत मिल सके।
हालांकि पहली ही बारिश ने यह संकेत दे दिया है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में स्थिति और गंभीर हो सकती है। खासकर तब, जब गोला गोकर्णनाथ में शिव मंदिर कॉरिडोर परियोजना का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। भविष्य में यहां देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं के आने की संभावना है। ऐसे में यदि जलभराव की समस्या बनी रहती है तो श्रद्धालुओं के साथ-साथ स्थानीय लोगों को भी भारी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी धार्मिक और पर्यटन नगरी की पहचान केवल उसके धार्मिक महत्व से नहीं, बल्कि वहां की आधारभूत सुविधाओं से भी होती है। यदि सड़कें, नालियां और जल निकासी व्यवस्था बेहतर नहीं होगी तो शहर की छवि प्रभावित हो सकती है।
फिलहाल पहली बारिश ने नगर प्रशासन, पालिका और संबंधित विभागों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अब देखने वाली बात यह होगी कि बरसात का मौसम पूरी तरह शुरू होने से पहले प्रशासन और शासन इस समस्या के समाधान के लिए कितनी तेजी से कदम उठाते हैं। क्योंकि अगर हालात नहीं सुधरे तो छोटी काशी की यह तस्वीर आने वाले समय में और भी चिंताजनक हो सकती है।



