गले में अटक गई थी मौत! 3 साल के मासूम ने निगल लिया ₹5 का सिक्का, फिर 120 मिनट में डॉक्टरों ने कर दिखाया चमत्कार
भोजन नली में फंसा था सिक्का, सांसों पर मंडरा रहा था खतरा... बिना चीरा लगाए एंडोस्कोपी से निकाला बाहर, मेडिकल कॉलेज की टीम ने बचाई मासूम की जिंदगी

सोचिए, खेलते-खेलते एक मासूम ने पांच रुपये का सिक्का निगल लिया। कुछ ही मिनटों में परिवार की खुशियां चिंता में बदल गईं। अस्पताल पहुंचते ही पता चला कि सिक्का भोजन नली में फंसा है और जरा सी देरी जानलेवा साबित हो सकती है। लेकिन फिर शुरू हुई समय के खिलाफ एक जंग, जिसमें विज्ञान और डॉक्टरों की सूझबूझ ने मौत को मात दे दी।

लखीमपुर खीरी में एक ऐसा मामला सामने आया जिसने एक बार फिर साबित कर दिया कि समय पर इलाज और आधुनिक चिकित्सा तकनीक किसी की भी जिंदगी बचा सकती है। तीन साल के एक मासूम बच्चे के लिए खेल-खेल में निगला गया पांच रुपये का सिक्का अचानक जान का खतरा बन गया। परिजनों की घबराहट, बच्चे की पीड़ा और समय के खिलाफ चल रही दौड़ के बीच मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने महज दो घंटे के भीतर ऐसा ऑपरेशन कर दिखाया, जिसने न केवल बच्चे की जान बचाई बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यक्षमता का भी बेहतरीन उदाहरण पेश किया।
खेलते-खेलते निगल लिया पांच रुपये का सिक्का
घटना सोमवार सुबह की है। परिजन अपने तीन वर्षीय बच्चे को लेकर स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय, लखीमपुर खीरी के सम्बद्ध जिला चिकित्सालय मोतीपुर पहुंचे। उन्होंने डॉक्टरों को बताया कि बच्चा खेलते-खेलते पांच रुपये का सिक्का निगल गया है। शुरुआत में उन्हें लगा कि शायद सिक्का अपने आप निकल जाएगा, लेकिन बच्चे की बेचैनी और दर्द लगातार बढ़ता जा रहा था।
अस्पताल पहुंचते ही ईएनटी ओपीडी में मौजूद असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मनोज शर्मा ने मामले की गंभीरता को समझा और बिना समय गंवाए तत्काल एक्स-रे कराने का निर्देश दिया।

एक्स-रे रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
जब एक्स-रे रिपोर्ट सामने आई तो डॉक्टरों की आशंका सही निकली। पांच रुपये का सिक्का भोजन नली यानी इसोफेगस (Esophagus) के शुरुआती हिस्से में फंसा हुआ था। यह वह स्थिति थी जिसमें थोड़ी सी भी लापरवाही या देरी बच्चे के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती थी।
भोजन नली में फंसी ऐसी वस्तुएं कई बार सांस लेने में दिक्कत, संक्रमण या अन्य जटिलताओं का कारण बन सकती हैं। यही वजह थी कि मेडिकल टीम ने इसे इमरजेंसी केस मानते हुए तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी।
शुरू हुई समय के खिलाफ जंग
मेडिकल कॉलेज की प्रधानाचार्य प्रोफेसर डॉ. वाणी गुप्ता के निर्देशन में पूरी टीम सक्रिय हो गई। अस्पताल प्रशासन ने बच्चे को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए ऑपरेशन थिएटर की तैयारियां शुरू कर दीं।
इमरजेंसी प्रोटोकॉल लागू किया गया और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम को तत्काल बुलाया गया। हर मिनट कीमती था क्योंकि सिक्का जितनी देर भोजन नली में रहता, जोखिम उतना ही बढ़ सकता था।
बिना चीरे के निकाला गया सिक्का
दोपहर करीब 12:45 बजे बच्चे को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया। असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. श्वेता वर्मा ने सुरक्षित एनेस्थीसिया देकर बच्चे को बेहोश किया ताकि प्रक्रिया के दौरान उसे किसी प्रकार की परेशानी न हो।
इसके बाद असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मनोज शर्मा और उनकी टीम ने आधुनिक दूरबीन तकनीक यानी एंडोस्कोपी का इस्तेमाल किया। इस प्रक्रिया में शरीर पर कोई चीरा नहीं लगाया जाता और एक विशेष उपकरण की मदद से अंदर फंसी वस्तु को बाहर निकाला जाता है।
कुछ ही मिनटों की प्रक्रिया के बाद डॉक्टरों ने भोजन नली में फंसा पांच रुपये का सिक्का सुरक्षित बाहर निकाल लिया। सबसे बड़ी बात यह रही कि बच्चे के शरीर पर न कोई चीरा लगा और न ही किसी प्रकार के टांके लगाने पड़े।
120 मिनट में पूरा हुआ मिशन
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे खास बात इसकी रफ्तार रही। सुबह करीब 11 बजे बच्चे का अस्पताल पहुंचना, जांच होना, एक्स-रे रिपोर्ट आना, ऑपरेशन की तैयारी और दोपहर एक बजे से पहले सिक्का निकाल लेना—यह सब महज दो घंटे के भीतर पूरा कर लिया गया।
डॉ. वाणी गुप्ता के अनुसार यह उपलब्धि मेडिकल कॉलेज की तत्परता, आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और डॉक्टरों के उत्कृष्ट टीमवर्क का परिणाम है।
लौट आई माता-पिता की मुस्कान
जिस समय डॉक्टरों ने सिक्का निकालकर परिजनों को दिखाया, उस समय उनके चेहरे पर राहत साफ दिखाई दे रही थी। कुछ देर पहले तक जिनकी सांसें अटकी हुई थीं, उनके चेहरे पर फिर से मुस्कान लौट आई।
परिजनों ने पूरी मेडिकल टीम का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि डॉक्टरों ने उनके बच्चे को नई जिंदगी दी है। उन्होंने डॉक्टरों को भगवान का रूप बताते हुए अस्पताल प्रशासन की सराहना की।
विज्ञान और संवेदनशीलता की जीत
यह घटना केवल एक सफल ऑपरेशन की कहानी नहीं है, बल्कि यह आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, प्रशिक्षित डॉक्टरों और समय पर मिले उपचार की ताकत का उदाहरण भी है। जिस सिक्के ने एक परिवार की खुशियां छीनने की तैयारी कर ली थी, उसी सिक्के को डॉक्टरों ने कुछ ही मिनटों में बाहर निकालकर संभावित खतरे को टाल दिया।
लखीमपुर खीरी मेडिकल कॉलेज की यह सफलता बताती है कि आज सरकारी अस्पतालों में भी आधुनिक तकनीक और विशेषज्ञ चिकित्सकों की बदौलत गंभीर से गंभीर मामलों का सफल उपचार संभव है। यह घटना उन अभिभावकों के लिए भी एक सीख है कि छोटे बच्चों के आसपास सिक्के, बैटरी या अन्य छोटी वस्तुएं रखने में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
क्योंकि कई बार खेल-खेल में हुई एक छोटी सी गलती, बड़ी मुसीबत का कारण बन सकती है। लेकिन इस बार विज्ञान, अनुभव और डॉक्टरों की तत्परता ने मौत को मात देकर एक मासूम की जिंदगी बचा ली।



